श्राद्ध पक्ष में गाय को रोटी देना ओर सनातन धर्मियों का विज्ञान।
हमारे पूर्वज सनातन धर्मी आर्य ओर भारत के प्राचीन निवासी सूर्य को जल को पृथ्वी वायु अग्नि को आकाश को देवता मानते थे ओर उन्होंने बहुत सी परम्परा चलाई जो गाय यानी गौ माता से संदर्भित थी। गाय को रोटी देना, अमावस्या की रोटी, गौ ग्रास, पितृ पक्ष की गाय को रोटी देना आदी बहुत चीजें हैं लेकिन आज छोटा विषय लेंगे :-पितृ पक्ष निकलना या कनागत निकलना । क्या आप इनके पीछे की सच्चाई जानते हैं अगर नहीं तो आपको मैं पुनः मेरे पिछले लेख वाली बात याद दिला दूँ की भस्मासुर के वरदान से खोप खाये देवता गौ माता जो तत्कालीन कपिला गाय नामक जीव थी उसके गर्भ में छुप गए थे ताकि उन्हें मारा ना जा सके ओर वहीं करीब 9माह कुछ दिन छुपे रहे 10 वे महीने में भगवान शिव ने विष्णु भगवान से विनती की मोहिनी रूप धारण कर आप उसे निर्त्य कराओ ओर ये आशन कराओ आदी निर्देश दिए ऐसा हुआ तब कही जाकर उसका संहार हुआ। क्या गौ माता के बीना ऐसा संभव था। गौ माता जो सतयुग में अजर अमर थी क्योंकि उन्हें देवलोक में वरदान मिला था, गौ माता में समस्त देवियां निवास करती हैं ओर सब देवता भी वो उस युग में भी थे आज भी वरदान सवरूप विद्यमान हैं। इतने समय देवताओं को गर्भ में रखने के कारण ही गौ "माता "कहलाने की हकदायी हुई हैं। नमन है गौ माता को।
लेकिन ये बात भारतीयों को पता कैसे चली पीढ़ी दर पीढ़ी याद कैसे रही ये हमारे पूर्वजों ने हमें बताया। महान वैज्ञानिक थे हमारे पूर्वज :-उन्होंने धर्म को विज्ञान से जोड़ा क्योंकि क्योंकि दोनों का बचाव तभी संभव था इस बारे में भी कभी विस्तार से बताऊंगा। धर्म में आस्था थी। सनातनी लोगो की मान्यता धर्म के प्रति थी। लेकिन हमारे ये पुरखे साधारण प्रतिभा वाले नहीं थे वो इस धरती को बचाना चाहते थे जल परलय से क्योंकि सबसे बड़ा खतरा जल ओर अग्नि से ही प्रारम्भिक प्राचीन भारत में था। आज भी मुख्य वही है फिर जीवाणु विषाणु का खतरा। उप गरही अदृश्य सक्ति का खतरा। सब कुछ ख़तम होने ओर कुछ जानवर ओर इंसान बचने पर टाइम पास कैसे हो। कौनसे जानवर बचाये जाएँ सब पे उन्होंने दिमाग़ लगाया ओर सोंच कर कहा की :-"हमारे जो वंसज हमें कनागत पक्ष में रोटी देंगे वो ही हमारी आत्मा को शांति देंगे।" हम उन्हें सब आशीर्वाद देंगे ओर वो जीवन भर पितृ आसीस से सुख प्राप्त करेंगें।
कनागत पक्ष में रोटी देना :-ये क्या धार्मिक विधि है की कनागत पक्ष में जब महीने की तिथ सुरु होती हैं तो हमारे बुजुर्गों की मिर्त्यु वाली तिथि को हम 4-4-4या 2-2-2करके टिकड़ी या मंडकी रोटी की बनाते हैँ ओर उसे कर्मश:-कागला( कौआ )गाय ओर कुत्ते को खिलाते हैं। क्या आप इसका कारण जानते हैँ क्यों इसके पीछे वज्ञानिक महत्व है। कौआ इसमें सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि वो सबसे लंबा जीवन जीता है। कौआ ज्यादा तर कनागतो में गर्भित रहता है ओर गूलर आदी बरगद पीपल के फल खाता है। इनका बीज बोया नहीं जाता ये पेड़ पक्षियों के गर्भ पेट में तैयार होता है ओर बीट में उगता है ये पेड़ अगर भारी मात्रा में होतो कटाव रोक सकता है ओर अपना 70%हिस्सा डूब जाने परभी ऊपर बढ़ सकता है ओर सीमेंट से लेकर बजरं मिट्टी पुराने मकान आदी में भी उग ता है। हमारे पूर्वज ऐसे पेड़ों को जन्म जन्मांतर रखना चाहते थे इसके लिए गर्भ धारण समय में भोजन कराना जरुरी था ये भू कटाव ओर बाढ़ से धरती को बचा सकते थे। । दूसरा गाय ऐसा जीव है जिसके मूत्र ओर गोबर हर मनुष्य के दुश्मन वायरस को मारते हैं उसे वरदान है ओर अकेले कोई वनस्पति ना भी हो तोमनुष्य गौ माता का केवल दूध पी कर जीवन बचाया सकता है ओर गौ माता घास फूस खा कर । तीसरा कुत्ता परग्रही अदृस प्रा सक्ति देख सकता है ओर मनुष्य का सच्चा मित्र भी है समय आने पे मनोरंजन भी करता है ओर सर्व भकसी है। अगर ये जीव बच गए तो परलय के बाद भी मानव को याद किया जायेगा पुनः नस्ट होकर भी जीव पैदा हो सकते हैं। ओर धरती पे जीवन ख़तम नहीं होगा। इसलिए वो कहते थे अगर हमें भोजन कराना चाहते हो तो कनागत निकालो या पितृ पक्ष में रोटी देने से पितरों को शांति मिलती है। पञ्च गवह जो शरीर से आत्मा तक शुद्ध करता है उसका भी अपना महत्व है ओर बीना गाय के ये बनाना असंभव है। ओर गाय को ग्रास देना या हवन में समस्त देवताओं को उच्चारित कर आहुति देना एक ही बात है। क्योंकि इसमें भी वो
सब विराजमान हैं। गाय माता को गुड़ से रोटी देना या आकिल खागड़ को देना शास्त्रों में देव परमाहुति के बराबर सर्व कार्य सीधी करने वाली हैं। ऐसी महान देवी गौ माता ओर उसके प्रभाव को जानने वाले सेवक हमारे पूर्वजों को सत सत नमन। मानव को हानी पहुँचाने वाले वायरस दैविक ऊर्जा के कारण गौमाता के सामने टिक नहीं पाते ओर ये एक श्रेठ जीव बन कर मानव मित्र बन कर वर्षों से साथ रही है। मुझे हमारे बुजुर्गों ओर गौ माता के विषय में लिख ने का अवसर मिला परमपिता ओर गौ माता का सुकरगुजार हुँ। धन्यवाद।
मित्रो सुनो माता मान लो गाय को, जाग जाओ। मान जाओ।
वो जान गए थे, ओर मान गए थे।
मातृ तीन जगत में जननी धरा ओर गाय
ना जननी हो पाल दे, तो चौथी हो जाय
पुत्री विवाह ओर वृक्ष लगा तो 2कर्ज घटे
दिन हीन गौ सेवा से कर्जा हट फल पाए,
जीवन सफल कहाय, जीवन सफल कहाया
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सबसे पहले मैं मेरी पोस्ट को पढ़ने वाले सभी पाठकों को नमन करता हूँ की आपने मेरी लेखनी से निकले इन शब्दों को पढ़ा ओर इस विषय पर लिखे गए लेख में रूचि दिखाई, प्यारे विधार्थीयो ओर पाठक मित्रो मेरा उद्देश्य विषय परक सटीक महत्वपूर्ण ओर सही जानकारी आपको देकर आपके ज्ञान संग्रह को बढ़ाना है ओर मेरी कोशिस रहती है की तथ्य परक बात की जाये वही करता भी हूँ परन्तु इंटरनेट पर लेखन का ज्यादा अनुभव ना होने के कारण लिखने में भाषागत वर्तनी सम्बंधित अशुद्धि रह गई हैँ अतः आपसे अनुरोध है कृप्या शब्दों के भाव को ही महत्व देकरअशुद्धि को इग्नोर करें। ओर अगर फिर भी आपको मेरे शब्द कहीं परेशान करें तो आप मुझे :-vikashji 354@gmailcom पर लिख सकते हैं,mb no 9812073306है लेख में कोई गलती हो तो मैं क्षमा प्राथी हूँ।
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