सूर्य को जल अर्पण के सहस्त्रों लाभ हैं
सनातन धर्म की कुछ शिक्षाओं मे एक है सूर्य को जल अर्पण जिसके लाखों लाभ हैं इसी प्रक्रिया का प्रारम्भ क्रम सुबह जल्द उठने से है जिसके भी हजारों लाभ हमारे वेद पुराणों मे लिखें हैं इसी प्रकार दूसरे धर्मों मे भी होगा मेरा कहने का मतलब धार्मिकता से नहीं प्राचीन समय से इसकी उपयोगिता से है। जब हम जल्द उठते हैं तो हम अंधकार से प्रकाश मान होते संसार को देखते हैं जो मनोवज्ञानिक सकारत्मकता की संरच्चना करती है मस्तिक मे की अंधकार के बाद प्रकाश अवश्य होता है। इस समय मस्तिक शांत ओर अति गति सील अवस्था मे होता है ज्ञानार्जन हो या कोई अन्य उपयोगी किर्या जैसे योग प्राणायाम ध्यान पूजा पाठ सब मे इस समय पर सकारात्मक परिणाम मिलते हैं। फिर दूसरी अन्य कामों पर धयान डाइवर्ट नहीं रहता, वातावरण का लाभ भी मिलता है। सुबह उठने से समय की अधिकता का लाभ भी मिलता है। सुबह के वक्त ही मस्तिक अधिक जागृत अवस्था में रहता है।
प्रभाव :-जब जल को कासी या ताम्र बर्तन में लिया जाता है तो जल रोगाणु मुक्त हो जाता है वही जल जब सूर्य के प्रारम्भिक प्रकाश में आता है फिर वायु आकाश पृथ्वी से टकराता ह अंत में जब पुनः ऊपर उठता है तो प्रकाश सवरूप ऊर्जा की मेग्नेटिक किरणे शरीर को मिलती हैं जिनमे असीम ऊर्जा होती है। जिन प्रकाश किरणों में पांचो तत्वों का निचोड़ शरीर में जाता है। क्या आप जानते हैं हमारे प्राचीन ऋषि मुनि नदियों में सूर्य को जल अर्पण क्यों किया करते थे ये प्रातः काल उनका निमित्त करम क्यों था वो भूमि पर सूर्य नमस्कार ओर सूर्य जल अर्पण की प्रक्रिया क्यों ना करके जल में करते थे ओर छत्रिय ओर सेना से सम्बंधित लोग या राजा अग्निहोत्र सूर्य नमस्कार (जिसमे सुबह ताम्बे के बर्तन में गाय के घी में उपले जला कर भगवान ओर सूर्य देव को नमस्कार किया जाता है।)या भूमि पर सूर्य अर्घ या जल अर्घ्य देते थे। इसका कारण कठोरता ओर शीतलता की ऊर्जा को जादुई ओर अधिक मात्रा में प्राप्त करने के लिए होता था। ओर वर्षों तक भारतीय लोग मजबूत ओर शांत रहे क्योंकि वो ये वज्ञानिक क्रिया करते आ रहे थे। मानव बहुत रूपों में सूर्य ओर जल से सक्ति प्राप्त करता रहा है। हिन्दू धर्म जल ओर सूर्य को देवता मानता है ओर इनकी सक्ति के कारण ये वास्तव में ही हमारे पूजनीय हैं क्योंकि विभिन्न रूपों में इनके अनेक लाभ हैं। अधिक लाभ हेतु सूर्य की पहली किरणे आने पर क्रिया सुरु करें। ताम्बे का लोटा प्रयोग करें तो बेहतर है याद रखें ताम्बे का एक ही लोटा होता था जिसमे बुजुर्ग रेत से मांझ कर सोच से लेकर जलपान तक कर लेते थे क्योंकि ये शुद्ध धातु है ओर आधुनिकता से प्रमाणीत है। धोती बांधे या पाजामे के पाव ऊपर कर लें क्योंकि जल का आपके शरीर को छू ना महत्व पूर्ण है। तुरंत बाद कुछ पल तक किसी चीज को छुए नहीं क्योंकि ऊर्जा आपके शरीर में ही समाहित रेहनी चाहिए।
लेखक विकास तंवर खेड़ी :-सबसे पहले मैं मेरी पोस्ट को पढ़ने वाले सभी पाठकों को नमन करता हूँ की आपने मेरी लेखनी से निकले इन शब्दों को पढ़ा ओर इस विषय पर लिखे गए लेख में रूचि दिखाई, प्यारे विधार्थी मेरा उद्देश्य विषय परक सटीक महत्वपूर्ण ओर सही जानकारी आपको देकर आपके ज्ञान संग्रह को बढ़ाना है ओर मेरी कोशिस रहती है की तथ्य परक बात की जाये परन्तु इंटरनेट पर लेखन का ज्यादा अनुभव ना होने के कारण लिखने में भाषागत अशुद्धि रह गई हैँ आपसे अनुरोध है कृप्या शब्दों के भाव को ही महत्व देकर इसे इग्नोर करें। ओर अगर फिर भी आपको मेरे शब्द कहीं परेशान करें तो आप मुझे :-vikashji 354@gmailcom पर लिख सकते हैं, लेख में कोई गलती हो तो मैं क्षमा प्राथी हूँ।
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