गाय को साधारण पशु समझना भूल,दर्सन मात्र से कई तीर्थो का फल मिलता है, गौ सेवा से होता है जन्मांतर के पापों का नाश।

देवताओं के शरीर में वास की कहानी :-कहते हैं जब भस्मासुर ने देवताओं का पीछा किया तो उनको छुपने को जगह नहीं मिली ऐसे में वो ऋषियों के आश्रम गए वहाँ भी भस्मासुर ऋषियों का भी दुश्मन हो गया। बिजली सवरूप देववाणी जो आकाशवाणी के नाम से जानी जाती है वो समस्या को जटिल होते देख भस्मासुर वध तक कपिला गाय से मदद मांगने हेतु देवताओं का मार्ग दर्सन कियाक्योंकि उन्हें अमृता का वरदान प्राप्त था ।देवताओं ने माता से सरन की अनुमति मांगी ओर  सारे देवताओं ने गौ माता के विभिन्न अंगों में वास किया। भस्मासुर में इतनी सक्ति नहीं थी की माता कपिला के सवरूप को वो देख भी पाता। जब भस्मासुर वध हो गया तो देवताओं ने माता कपिला गाय को वरदान मांगने के लिए बोला तो उन्होंने कुछ नहीं मांग कर उसे अपना सौभाग्य बताया ओर कहा की आप इसी तरह मेरे शरीर में वास करते रहिये ओर ऐसा हुआ भी सवं ब्रह्मा विष्णु महेश भी शरीर में रहे ओर सुख का अनुभव किया बदले में अनेकों वरदान भी दिए। अपने शरीर में जगह देने के कारण ओर देवताओं को बचा कर जीवन देने के कारण वो कामधेनु माता कहलाइ । तब से आज तक गाय देवी सक्ति प्राप्त जानवर है ओर उसमें वो है जो किसी अन्य जानवर में नहीं उसे साधारण ना समझें । जय हो गौ माता की। 
गाय को साधारण पशु समझना मूर्खता की बात है। हमारे शास्त्रों में गाय को देवी सवरूपा कपिला आदी नामो से पुकारा गया है। ओर आप पढ़ेंगे तो काफी कुछ है मैं गहरा नहीं जाऊंगा -वास्तव में ही गाय है ही  सभी जानवरों से ज्यादा गुणसील।  खान पान से शाकाहारी जीव जो सायद मनुष्य की तरह बोल तो नहीं पाता लेकिन है बहुत समझदार। अमिनिटी सिस्टम जबरदस्त है ओर गौ मूत्र ओर गोबर से हजारों बिमारियों का इलाज हो सकता है ये बात अब काफ़ी शोध होने के बाद साबित हो चुकी है।गाय का मास खाने के होने वाले रोग जितने  ज्यादा ख़तरनाक हैं उतना इसका लाभकारी दूध है। आज ईसाई समुदाय वाले कई देश गौ माता का महत्व जान कर उसकी हत्या पर प्रतिबंध लगा चुके हैं अमेरिका इटली जैसे देश भी वर्तमान में गाय को साधारण पशु नहीं मानते। भारतीय नसल की गाय वास्तव में ही महत्व पूर्ण ओर बहुगुणी है जबकि जर्सी गायों में बहुत से गुण खत्म हो जाते हैं।   पीलिया,  ग्रहणी,  पेट के सोथ, वायरल बुखार, खासी जुकाम यहाँ तक की टीबी सभी स्टेज कैंसर ओर एड्स जैसे बीमारियों में भी ये उपयोगी सिद्ध हुआ है। इसके साथ हल्दी,तुलसी आदी का उपयोग से ओर भी सार्थक परिणाम देखे गए हैं। 

भारतीय शास्त्रों में गाय की पीठ पर हाथ फेरने से बीपी का प्रभाव सही होने की बात कही गई है। गाय वातावरण को शुद्ध कर सकारात्मक ऊर्जा लाती है। गौ सेवा या जहाँ गाय रहती है वहाँ गंभीर रोग कदम नहीं रखते। उसके मूत्र ओर गोबर में मानव शरीर के लिए लाभ दायक बहुत से जीवाणु होते हैं। जो शरीर में जाकर विश हरक का काम करते हैं। हालांकि किसी चीज की अत्यधिक मात्रा नुकसान दायक भी हो सक्ति है लेकिन जितने लाभ पृथ्वी पर प्राप्त किसी जड़ी बूटी में नहीं जिसकी इंसान को जानकारी है उससे कहीं ज्यादा गौ मूत्र से होते हैं ये विभिन्न प्रयोगों में सिद्ध हो चूका है। प्राचीन समय में गौ मूत्र ओर गोबर से आँगन लीपना ओर चुलहा लीपना इसी कारण होता था क्योंकि इससे शुद्धता आती थी ओर इसके अनेक लाभ थे इससे वो जगह हानिकारक  विषाणु मुक्त ओर वातावरण के अनुसार ठंडा गर्म अनुकूल हो जाती थी। गऊ माता के शास्त्रों में माता का दर्जा देने के पीछे ओर 33 करोड़ देवताओं की वाश करने के पीछे तथा रोग दोस के गाय से दूर भागने का कारण  इसका शाकाहारी होना है  गाय 
जहाँ रहती है वो घर महक जाता है। गाय को गुड़ से रोटी देने के धार्मिक लाभ हैं। गाय की सेवा से मनुष्य को पितृ सेवा के समान ओर भी ज्यादा दैविक लाभ मिलता है इसके घरमे होने से सवस्थ,  धन, ओर जीवन का लाभ मिलता है। मानव देह के तारण में गाय का लौकिक ओर भौतिक दोनों प्रकार से विशेष महत्व है। माता के समान सनेह, दूध ओर अन्य लाभ देने के कारण ऋषि मुनियों ने गौ को माता का दर्जा दिया जो आज भी सनातनी हिन्दुओ के चित में विराजमान है। इसकी तस्वीर घर में रखने के बाद कोई देवता की तस्वीर रखनी शेष नहीं बचती,गौ ग्रास के बाद कोइ भोग बकाया नहीं रहता।ऐसे महान देवआत्मा जो पशु सवरूप में हमारे बीच विराजित रहती हो ओर मानव का कल्याण करती हो को मैं तहदिल से नमन करता हूँ।ओर परमात्मा से विनती करता हुँ की मुझे इसका सेवा का अवसर यूँ ही मिलता रहे। 
महर्षि सतायु का एक जिक्र शास्त्रों में आता है की उनको बचपन से ही आधातम की लगन थी जिन्होंने वर्षों तक तपस्या की ओर शाकाहारी होने के कारण अच्छा स्वस्थ भी पाया। उनकी लम्बी आयु के कारण ये नाम पड़ा तप के मार्ग में पहली सर्त शाकाहारी भोजन था महर्षि को पता था की कुछ खाये पिए बीन लम्बे समय तप मुश्किल है पर समस्या ये थी की वो जो भी चीज खाते उसमें उनको सुसुप्त या जागृत अवस्था में जीव ही दिखता उनकी कई दिन भूखे प्यासे तपस्या करने से वो मरना सन्न हो गए तो भगति की थी सो शिव भगवान प्रकट हुए ओर वरदान मांगने की बात कही, तो  शिव भगवान से उन्होंने शाकाहारी बने रहने का ओर शाकाहार चीज खा कर गुजारा करने का वरदान चाहा जिसमें किसी जीव को हानी ना पहुंचे। ऐसा करने के लिए उनकी मदद भगवान की कृपा से कपिला गाय ने की जिन्होंने अपनी सेवा के बदले शाकाहारी दूध उन्हें दिया। कहते हैं महर्षि सतायु उनके मूत्र को पी कर समाज को सन्देश देना चाहते थे की जिसका आप दूध पीओ उन माता की सेवा से घृणा मत करो इसी लिए वो अमृत सवरूप गौ मूत्र का पान करते थे। जिसे देख कर परम शिव की कृपा से गौ मूत्र अमृत से भी पवित्र ओर रोग निवारक हो गया। 
गाय की सेवा में सब सेवा निहित हैं। अतः जब भी अवसर मिले लाभ जरूर लें। गौ माता धार्मिक ओर वैज्ञानिक दोनों कारणों से ही मातृ सवरूप है इसकी सेवा का लाभ जरूर उठायें। सबसे पहले मैं मेरी पोस्ट को पढ़ने वाले सभी पाठकों को नमन करता हूँ की आपने मेरी लेखनी से निकले इन शब्दों को पढ़ा ओर इस विषय पर लिखे गए लेख में रूचि दिखाई,  प्यारे  विधार्थीयो ओर पाठक मित्रो  मेरा उद्देश्य विषय परक सटीक महत्वपूर्ण ओर सही जानकारी आपको देकर आपके ज्ञान संग्रह को बढ़ाना है ओर मेरी कोशिस रहती है की तथ्य परक बात की जाये वही करता भी हूँ परन्तु इंटरनेट पर  लेखन का ज्यादा अनुभव ना होने के कारण लिखने में भाषागत वर्तनी सम्बंधित अशुद्धि रह गई हैँ अतः आपसे अनुरोध है कृप्या शब्दों के भाव को ही महत्व देकरअशुद्धि को  इग्नोर करें। ओर अगर फिर भी आपको मेरे शब्द कहीं परेशान करें तो आप मुझे :-vikashji 354@gmailcom पर लिख सकते हैं, लेख में कोई गलती हो तो मैं क्षमा प्राथी हूँ। (विशेष :-लेखक कामधेनु सेना नागौर के सदस्य हैं ओर सनातन धर्म के विषय में अनुभवी विचारवादी लेखक हैं। )

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