अच्छी या बुरी सोंंच
पाकिस्तान की घटना थी भारत भी जिससे दुर नहीं
लोगों में भ्रष्टाचार कूट कूट के भरा है। किसी ने नए टायर को पुरानी ट्यूब में डाल कर टायर पेंचर वाले को दिया की 10मिनिट में आऊंगा पेंचर चैक कर देना।थोड़े देर बाद आया तो पेंचर वाले ने 80रूपये मांग लिए 2पेंचर बता दिए।
ऐसे ही टेलीविजन ठीक करने वाले के पास सही टेलीविजन ले जाया गया जिसमें कोई फाल्ट नहीं था ओके कंडीशन थी , फ्रीज वाले को फ्रीज दिखाया गया। टेलीविजन वाले ने 1300रूपये खर्चा बताया बोला इसकी ट्यूब में प्रॉबलम है। फ्रीज बिल्कुल सही था फ्रीज वाले ने 700रूपये खर्च बताया बोला करेंट की सॉकेट जल गई है।
यानि सब को धंधे से मतलब है झूट सच सब चलाएंगे अपना धंधा चले बस।
लोग चोरी करते हैं उन्हे आनंद आता है। मानव परविर्तियों में दुसरे को दुखी देख खुश होने दूसरों की खुशी से चीड़ ने, दुसरे से जलने, दूसरों का हक मारने जैसे दुर्गुण पाए जाते हैं ये मानव स्वभाव में रच चुके दुर्गुण हैं।
जो इन गुणों से दुर रहता है और निस्वार्थ दूसरों की मदद भी करता है प्रेम भाव रखता है वही देवपुरुष कहलाता है। मेरे एक नजदीकी रिश्तेदार हैं कई बार उनके दिव्यगुण देख कर सोंचता हूं की धरती पर आज भी इन्सान रूप में देवता बस्ते हैं । क्योंकि वो बड़े ओहदे पर होकर भी आम में आम और ख़ास में भी समान्य रहते हैं बिरले ही व्यक्तित्व एसे मिल पाते हैं।
और लालसा अधिक चाह, चीढ हद से ज्यादा और कम समय में सफ़लता का लालच इन्सान को अपराधी बनाता है।
इन्सान अपनी नजर में तो बच जाता है प्रकृति के चककर से नहीं बच पाता है।
उपर वर्णित दुर्गुणों का होना और बढ़ना अपराध का कारण होता है।
लाओत्से कहते हैं:सब का निश्चित है।
श्री कृष्ण कहते हैं_ "यत्र कर्म: तत्र फल "जैसे काम वैसा फल मिलता है।
महान ओसो भी कहते हैं:
"रोशनी की तरफ जानें वालों को रोशनी है
बाकी तो अंधेरे के हमसफर हैं अंधेरा ही उनकी सरजमीन है।"
पर क्या सब लोग एसे ही जीते हैं।सब की सोच अलग है। व्यवहार अलग है। कुछ चीजें समाज में पैदा होती हैं। सामाजिक गलती बेरुख्यियों के कारण। कुछ मानव के व्यवहार में उसकी उपलब्धियों यानि आदतों के कारण।जो आदतें हैं उन्हे सुधारा जा सकता है और खुद सुधार कर सामाज में सुधार लाया जा सकता है।
Time witness के लेखक लिखते हैं की सद्गुण इन्सान में जन्मजात होते हैं। लेकीन इंद्रियों पर सामाज के रहन सहन का पराभव आने से ये गुण खतम होते चले जाते हैं। सिर्फ़ दृढ़ मनोबल अच्छे शिक्षण और धार्मिक पड़ोसी पर्वृति में ही सद्गुण बच पाते हैं।
अच्छे साहित्य सामाजिक लोगों के साथ सहयोग से दुर्गुणों को सगुनौ में बदला जा सकता है। ज्यादा व्यवहार कुशल और सच्चा इन्सान बना जा सकता है जो की आडंबरी दिखावा ना करे ओर सिर्फ़ काम से काम रखे दूसरों को हानि ना पहुंचाए और वक्त आने पर समाज सेवा हेतु भी तत्पर रहे यानि सेवा भावी हो। अच्छी पुस्तकें भी हमें सही दिशा देती हैं। हमे एसा बनाने में मदद करती हैं।
जो सब की भलाई चाहे।जो मन से साफ हो।
बेसक आज बहुत कम लोग ऐसा बनना चाहें पर ऐसे लोग आज भी सब जगह पसन्द किए जाते हैं
ये लोग अंतर के धनी होते हैं। विभिन धार्मिक ग्रंथों में इन्हे ही देवतुल्य कहा गया है। मैं ईश्वर से मुझ में और आप सब में मानवता वादी गुणों को बढ़ाने और असीम ऊर्जा प्रदान करने हेतू प्रार्थना करता हूं।
आपका विकास तंवर खेड़ी।
Comments
Post a Comment