अर्थ से ही अर्थ

देश की अर्थव्यवस्था अहम होती है।इसके लिए चाणक्य जैसी बुद्धि ओर कड़ी मेहनत चाहिए तब ये संवर निखर पाएगी।



भारत भूमि:
ये देव भूमि ही है जिसका अस्तित्व विभिन्न परिस्थितियों में बना हुआ है प्रकृति देवी के उपासकों आर्यों के वंसजों पर प्रकृति देवी का आशिर्वाद है।ज्ञान भूमि विज्ञान भूमि विश्व जगत को उत्पति का मर्म सीखाने वाली भारत भूमि जिसने लाखों युद्ध झेले हैं,युद्ध इसको बदलने बनाने वाले अहम कारक हैं।विभिन पारिस्थितिक चकर्णो में भारत भूमि का गौरव बना हुआ है।युद्ध अलग चीज है और अस्तित्व अलग चीज ,युद्ध कई बार अस्तित्व के लिए जरूरी भी होता है और कई बार युद्ध को खत्म करके ही अस्तित्व बचाया जा सकता है।युद्ध सिर्फ हथियार का नहीं आर्थिक भी हो सकता है।राजनीति अकेली महत्वपूर्ण नहीं।निरंतर अस्तित्व को बनाये रखने में अहम रोल किसी देश की राजनीतिक आर्थिक व्यवस्था का होता है।

किसी देश की अर्थ व्यवस्था डूबने का मतलब है देश का डूबना ओर अर्थव्यबस्था सहज ग्रोइंग मोड में आ जाये ऐसा कभी सम्भव नहीं।मेहनत और ईमानदारी की जरूरत होगी जो दोनों ही गुण भारत की राजनीति में दृश्य हैं पर कृत्य में वर्तमान में बहुत ढूंढने पर अल्प दिखाई देते हैं मैं कांग्रेस भाजपा वाला दृष्टिकोण की बात नहीं करता,तुस्टीकरण ओर स्वार्थ ने विकास का वो स्तर खो दिया जिसमें गुप्त काल, राजपूत काल में देश ने पहचान बनाई,मुगल काल ने सायद इनको नाम दिया उसपे ज्यादा नहीं कहूंगा जब पुराने समय में व्यवस्था ज्यादा मजबूत है तो उदाहरण वही लूंगा।विभिन्न इमारतें आविष्कार,कलाएँ जैसे मुर्ती, नृत्य ,गायन,यहाँ तक कि प्रतियोगी परिक्षयाएँ पशू दौड़ जाने क्या क्या दिया वर्णन नहीं किया जा सकता गुप्त ओर राजपूत काल में।बढिया राज व्यवस्थाएं आज फिर यादगार बन जाती हैं सीमित मंत्री और राजदरबार, आजकल की तरह नहीं कि पेंसन भत्तों में ही एक बड़ा हिस्सा खजाने का चला जाये।और फिर जिम्मेदारियां ओर काम को करने का तजुर्बा, समय, निपुणता बहुत कुछ।क्योंकि वर्तमान में राजनेताओं की इच्छा सक्ति उनके अहं के द्वंद ओर चाहतों के आगे झुक जाती है।परेसानी सबको होती है जब कोई कुछ करने चले ,मुगल ओर अंग्रजों के समय की बात न करें तो उससे पहले गुप्त काल महाभारत काल में सीखने के लिए काफी कुछ है।परेशानिया सदा रही हैं मनुष्य हल करने वाला बना है।आजकल लोग बेमतलब कांटे बिछा देते हैं जबकि दूसरे देशों से बड़ा और समृद्ध संविधान हमारा बताया जाता है।बहुत बडी जनसंख्या वाला देश होने के कारण भारत में किसी अछी योजना का लाभ हर व्यक्ति को पहुंचना मुश्किल होता है नीरा निरी सविधान को या व्यवस्था को ही दोस दिया जाता है ऐसा नहीं कि संविधान या किसी एक चीज में ऐसा कहीं लिखा होता तो सब सही होता कह के पल्ला झाड़ लिया जाए संविधान समय की जरूरत थी और उसमें आवश्यक बदलाव भी जरूरी हैं लेकिन किर्यान्वन ओर सोंचों का विकास को गति हमें देना है जो उसे इस्तेमाल करेंगें वो एक पुस्तक ओर गाइड है बिना बुद्धि लगाए जब तक उसे सही से ना लिया जाए और समयानुसार फेर बदल ओर अर्थ न लिया जाए।सुझाव देने वाले बहुत कम मिलेंगें।सुधार की बात देश स्तर पे तो बहुत ही मुश्किल प्रतीत होगा लेकिन इतना भी नहीं यदि ठान लिया जाए तो हो नहीं सकता।देने को लाखों दलील दी जाती हैं अगर हम राजनीति में एक पार्टी को मुख्य इकाई समझें तो कोई पार्टी अपने को कम नहीं समझती वादे 100 kg के किये जाते हैं परिणाम 2 प्रतिसत आते हैं।ऐसा नहीं कि कर पाना मुश्किल होता है कठिनाइयां रास्ता रोकती हैं क्योंकि रास्ता नापने से पहले ग्राफ नहीं होता कोई स्केच नहीं होता कि काम होगा कैसे।नायक जैसी फिल्में तो भारत मे बन जाती हैं लेकिन जब कोई नायक चलता है खुद को तैयार करता है तो तो उसके राजनीति की बेड़ी डाली जाती हैं धर्म जाती और न जाने किस किस रूप में जो सायद दादा साहब अम्बेडकर, या अन्य आधुनिक गाइड जैसे नेता जी, महात्मा गांधी, भी कल्पना न कर पाए कि ये देश के विकास में कितना जहर घोलेंगे।इसके उदाहरण मेरे आदर्श ए पी जे कलाम जी ओर अटल बिहारी वाजपेयी जी रहे हैं।

ओरकुछ सामान्य हल हैं जो व्यवस्था को बदल सकते हैं।जब भारत मे कोई ब्लड डोनेट करने जाता है उसको प्रोत्साहित नहीं किया जाता हा एक प्रमाण पत्र जरूर दे दिया जाता है जो  अक्सर 90%भारतीयों के घर कागजों के कबाड़ बॉक्स में चला जाता है। ।अक्सर ब्लड बैंक में खून की कमी ही रहती है।कई बार फ्रूटी या कोई छोटा बिस्किट जरूर दिया जाता है खाने पीने के लिए ।ये कोई प्रोत्साहन नहीं है, ये तो जरूरी है ही लेकिन अगर रक्तदान कर्ता को घर से रक्त इक्कठा करने, गाड़ी से हॉस्पिटल ले जाने,कोई मनपसंद सुप,जूस या ओर कोई फिल्म की टिकट या रेस्टोरेंट में खाने का कूपन दिया जाए तो इसमें आशातीत वृद्धि देखी जाएगी।रक्त दाता को अगर आभास करा दिया जाए कि उसने वास्तव में कुछ खास किया है तो एक आदमी हर महिना भी रक्त दान कर सकता है।ज्यादा मात्रा में रक्त दाता ओर रक्त उपलब्ध होगा।वहीं दूसरी तरफ जब कोई अंगदान कर्ता है तो उसे किसी योद्धा के समान दर्जा मिलना चाइये ओर प्रत्यारोपित व्यक्ति को दाता के परिवार से भावनात्मक जुड़ाव वालीएक फिल्म दिखाई जानी चाइये जिसमें उनको दान प्राप्त करने वाले में दाता का अनुभव हो और प्राप्त करता को भी महत्व जान पड़े।
भारत मे आशातीत आर्थिक उन्नति सिर्फ और सिर्फ कृषि में उन्नत कृषि करके प्राप्त की जा सकती है ये उच्च स्तर की हो अत्यधिक बड़ी मात्रा में।उधोगों रक्षया के समान इसका बजट हो और खेत मे काम करेंगे तो स्वास्थ वैसे भी चमकेगा। क्योंकि देश कृषि प्रधान है वर्तमान प्रयास नगण्य हैं।कृषि बजट बहुत कम है।2020-21 बजट गूगल खोल के देखोगे 5.63%  है|जबकि आधा पैसा किसान को 6000 देने में चला जायेगा जिसमें पता नहीं वास्तविक खेत में ध्याडी कितने करते हैं ,को जाएगा यानी सही वितरण नहीं है।इतने बजट में भारत को 2050 में सायद बैलगाड़ी में ले जाया जाएगा।जबकि सपने राफल लड़ाकू से तेज गति के यात्री विमान में ले जाने के हैं।कृषि में विशेस सुधार की जरूरत है 50%यूनिवर्सिटी बंद कर कृषि कालेज खोलिए विश्व विद्यालय बनाइये ओर प्राइमरी एजुकेशन से इसे लाइये।कृषि मजदूरों की सरकारी भर्ती ,किसानों की भर्ती करिये।सायद लाभ मिले।अमेरिका में सरकारी सेवा या राजनीति वालों के लिए 5 साल आर्मी में जाना जरूरी है क्या भारत मे इनको 4 साल कृषि में अनिवार्य तौर पर जोड़ कर ओर कृषि शिक्षया अनिवार्य करके सुधार नहीं हो सकता।बहुत कुछ हो सकता है।वर्तमान में चीन रूफ गार्डनिंग, वेजिटेबल ग्रोइंग कर रहा है हमारे  यहाँ  भी घर घर में खेती हो सकती है सिटी में भी बिल्कुल जागरूकता ओर ट्रेनिंग से हो सकती है।किटनासकों का जहर भी खत्म हो जाएगा परंपरागत तरीके से अगर खेती हो।अगर साथ मे गो संवर्धन भी हो तो सोने पे सुहागा यानी आल इज वेल,इसपे फिर कभी लिखूंगा की कैसे।पर कृषि की जागरूकता ओर अनिवार्यता करके जोड़ा जाना जरूरी है।खेती को जीवन का हिस्सा बनाना होगा बहुत से तरीके विधि गूगल पर है परंतु सिखाने के लिए जबरदस्ती करनी पड़ेगी क्योंकि  यह हो सकता है।नोकरियाँ कि कमी नहीं है।सरकारी नोकरी जब चाहे जितनी पैदा कर लो।सरकारी सलून, सरकारी धोबिसाला बनाओ रेट फिक्स करो घर से ही कपड़े धुलवा लो दाढ़ी बनवा लो।बोर्ड बनाओ भर्ती करो पर सरदर्दी ले कौन कोई भी नई चीज में रिस्क है और बहुत कुछ है।यहां कॉन्ट्रेक्ट पे भर्ती नहीं हो पाती की कैसे लगाएं कहीं परमानेंट न करने पड़ जाएं।पेरममेन्ट किसान भर्ती करिये साहब सदा जरूरत पड़ेगी देस सम्रध भी होगा ।मनरेगा में मसीनो से जोहड़ साफ किये जाते हैं।जबकि लोगों के पास काम के लाले हैं।आम आदमी की रुचि नहीं।पेड़ लगाने हैं 5 दिन में 500,लेबर चौक पे 500 आदमी खड़े हैं 10 आदमी 8 घंटे के लिए नहीं मिले क्योंकि गढ़े खोदने पड़ेंगे ।मसीन लगवा लो जी बेरोजगारी बढ़ गई।पौधे लगाने पर इनाम रखो।ज्यादा लगाएंगे 10 की जगह 50 आदमी तैयार हो जायेंगे उनको बोलो जूस भी मिलेगा और दोपहर का लंच 500 के 500 तैयार हो जाएंगे।सरत रख दो 150 का आंकड़ा रोज पार करना जरूरी है ।यकीन मानिए हो जाएगा।यानी रुचि भी काम के साथ जरूरी है मजदूरों को अच्छा खाना देकर काम करने की समय व कार्यक्षमता में वृद्धि प्राप्त की जा सकती है।
।विदेशों में विकाससील देशों में मकान या खाना सबसे पहले दी जाने वाली सुविधायें हैं इंसान इनके लिए ओर इनके ऊपर ही जीता है।भारत मे रहने खाने की ही मारा मारी है।मैने खुद होटल इंडस्ट्री में काम किया था कितना भोजन रोजाना होटलों में बर्बाद होता है ना इसका अंदाजा लगा पाएंगे न इसका उपयोग आप कर पाएंगे क्योंकि वेस्टेज अगर कोई होटल करता है तो उसका मालिक मैनेजमेंट की ऐसी तैसी कर देगा वहां से वेस्टेज लेकर गरीब लोगों को पोसित किया जा सकता है पर किस तरह क्या वहां से आप वेस्टेज ले पाएंगे।अगर सरकार उनको उनसे प्राप्त वेस्टेज पर अंक दे और अंक पे उनको सब्सिडी दे तो वो गरीबों को भोजन उपलब्ध करा सकते हैं ट्रांसपोर्ट का काम इसमे प्राइवेट संस्था करे तो सब गरीब लोगों तक खाना जा सकता है कोल्ड स्टोर भी बनाने पड़ेंगे।रहने के लिए घर नहीं लेकिन देश में 40 पे  घर बेकार या 3-4तक हैं जिनके बिना सम्हाल के मेटीरियल वेस्ट हो जाता है घर कबाड़ हो जाते हैं, ऐसे घर govt सस्ते प्राइस पे या केवल देखभाल की जिम्मेदारी लेकर होम लैस परिवार को दिलाये ।ऐसे एक  एक वेब बना कर एक सोसाइटी बना कर अधिग्रहित करके मालिक से ले।मालिक को बदले में किसी अन्य लाभ के लिए सब्सिडी में छूट दे दे।मकान मालिक की सुरक्षया, लाभ और होम लेस को घर रेंट मिल  सकता हैआसानी से।या प्राइवेट लोगों को ngo को भी ऐसा करने के लिए हेल्प ले सकती है।ओर भी बहुत सुधार हो सकते हैं।रैन वाटर गेथरिंग ओर हार्वेस्टिंग की पुरानी टेक्निक पानी बचा सकती है बरसात के दिनों में काफी पानी स्टोर हो सकता है।
अभी आगे है...........
आपका अपना विकास तंवर खेड़ी

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