आधात्मिक कहानी- मनुष्य की उत्पत्ति कैसे
जब संसार की परिकल्पना हुई तो परम सकती परमात्मा से ब्रह्म उदय हुए उनसे ब्रह्म लोक बना ,समय विचरण सहयोग और मनोरंजन के लिए विभिन्न पसु पक्षियों वनस्पतियों जीवों को बनाया गया उन्हें धरती पर पोषित किया गया जो बरसात में धरती से निकलती थी।सब धरती से पैदा जीव अक्सर लड़ते की वो यहां रहेंगे वो यहाँ क्योंकि सब मे प्राण ,बुद्धि, आत्मा देकर उन्हें पूरा सजीव कर धरती पे भेजा गया ।सब को अपनी वाणी दी गई ,सब ब्रह्म से बात करते, जीव जगत, भाव, सजीव निर्जीव सब भगवान से बात कर सकते और ब्रह्म से भी बात कर सकते जो इन सबका निर्माण करने वाले थे,देवताओं के लोक ,पित्र लोक यमलोक बनाये गए ,जीवों के न्याय के लिए न्याय लोक बनाया गया, ब्रह्मांड के गृह नक्षत्र बनाये गए सूर्य चंद्र आदि ग्रह बनाये गए जिनमे किसी का काम रोशनी देना तो किसी का अंधेरा करना था।क्योंकि रोशनी ओर अंधेरा वो कारक थे जो उत्पति को समझने जानने के लिए जरूरी थे कि क्या चीज है पहचान के लिए दोनों आवश्यक थे तो विभिन्न जीवो निर्जीवों को रोशनी दी गई थी।बिना विभिन भावों ओर गुणों के सजीवता संसार मे आ नहीं सकती थी तो प्रेम और ममता भाव से युक्त माताओं कोगुण ओर भा व बनाने का काम दिया जिन्होंने विभिन्न भाव बनाये जो परकास रहित स्थान पे बने वो आसुरी थे जो रोशनी में बने वो दिव्य थे।जीवों की उत्पत्ति बरसात से होती गर्मी में वो धरती पे मर जाते पानी उनका अहम तत्व था जिससे सब व्यवस्थित नहीं हो पाता था आक्सीजन यानी वायु वो सांस में लेते थे अग्नि जो परकास का रूप थी सूर्य से उदित हुई अतः नए जीव में पंच भूत यानी पांच तत्वों के महत्व को जान कर उसे संजोना था।माताओं में प्रकृति एक माता थी जिसका ब्रह्मांड पर प्रभाव राज था,भु देवी धरती माता, बे देवी या बे माता -निर्माण और स्वरूपा देवी थी जो जीवों की कल्पना कर सकती थी और बनाती थी,मां लक्ष्मी धन ,सरस्वती ज्ञान आदि की देवी थी।ये विभिन आयामों में परिदृश्य थी।जीव जो धरती की सुंदरता मनोरंजन और कुछ समय के सजीव अनुभव के लिए धरती पर भेजे गए उनमें विभिन गुण दिए गए 1.दृश्य ओर .2अलौकिक दृश्य जैसे सुंदरता, बनावट, खान-पान, जो सबमे अलग अलग थे सिर्फ एक जाति एक तरह के गुण वाला वर्ग था जैसे घोड़ा घास खायेगा, उसके 3 रंग होंगे, उसकी इतनी ऊंचाई होगी।अलौकिक गुणों में ज्ञान अर्जन, सेवा, अनुभव,
सहयोग आदि 32 गुण थे और 16 अवगुण भी थे निंदा, अपघात, तिरस्कार आदि जो बाद में दोनों 100-100की गिनती में पहुंच गए।इन्हें सद्गुण ओर दुर्गुण बोला गया है।जब पसु बरसात या गर्मी में मरकर एकदम न्याय लोक में आते तो ये गुण उनमें परेशान हो जाते एक बार ये परेशान होकर ब्रह्म से बोले हममें आपका परकास है हम सद्गुणों में आपकी लो है, हमारे कर्म श्रेष्ठ हैं हम सब तरह दुर्गुणों से अछे हैं।फिर हमें उनके साथ बार बार पसु योनि में क्यों भेजा जाता है।हमें कष्ट होता है।हमारे ओर उनमें फर्क क्या रहा।बात सही थी लाइट ओर डार्क साइड दोनों एक ही जीव में तंग आ जाते।ब्रह्मा जी बोले जैसे वस्तु के परकास के साथअंधेरे में परछाई वैसे आप लोगों का साथ रहेगा सद्गुण बिना दुर्गुण ओर दुर्गुण बिना सद्गुण की पहचान नहीं हो सकती।अतः ये भरम निकाल दो- हैं मैं तुम्हारे लिए पसु योनि से बेहतर एक योनि बना सकता हूँ जिसमे अगर कर्म अछे होंगे तो आप लोग रह सकते हो या आपलोग रहकर उस जीव को सद्कर्म में यानी परम आनंद में ले जा सकते हो।कर्मो के साथ आप उजागर होंगे।जब सब सद्गुण सहमत हो गए मान गए तो नए जीव का नाम रखा मानव।जो मान रख के बनाया- किसका सद्गुणों का, उसकी विर्ती कैसी पसु जैसी- क्योंकि पसुओं के सद्गुणों से बना।और प्रधान कारक कौन उसके कर्म तय हो गया।देवियां बुलाई गई।प्राथना की गई।मामला समझाया गया कि मानव को निरूपित करना है।धरती में लेकिन ये सबसे बेहतर कृति होनी चाइये जिसमे सब कुछ यानी भगवान को पाने होने तक कि भी सकती हो लेकिन सद्गुण ओर कर्म ये उसके मुख्य कारक होंगे जो मुझ तक उसे पहुंचा देंगे।जब उसको बनाने लगे तो 9 महीने का समय लग गया।इंद्रियों को बनाना उनको काम देना।मस्तिक सरीर बनाना सोना जागना, हँसना रोना, भाव निरूपण, गुण समावेश बहुत कुछ किया गया।पूरा जीवन चक्र बनाया गया।और बाकी के जीवों को भी सजीव करने के लिए जीवन चक्र में कुछ कुछ चीजें मानव की मिलाई गई यानी सॉफ्टवेयर अपडेट कर उन्हें बेहतर किया गया।क्योंकि मानव विषेस था तो उसकी उत्पति का कारण बनाया गया।नर मादा तो पहले ही होते थे।मादा पर सवाल न उठे की नए जीव के बीज वो कहाँ से लाई तो उत्पति बीज नर में में निरूपित किये गए और निषेचन के बीज मादा में।कामदेव ओर रति देवी ने प्रकिर्या की जिम्मेवारी ली कि वो इसका जन्म का कारण बनेंगे।ताकि मानव के जन्म पर ताज्जुब कर आदमी हैरत में न पड़े। 9 माह सुरक्षा माता करेगी,गर्भ में वही पोषित करेगी क्योंकि जीव माताओं की सोंच से तैयार हुआ तो माँ अहम रहेगी स्त्री का आदर भी जीव तभी कर पायेगा जब ये समझेगा की उसे कैसे सहेजने में स्त्री का रोल है।दूसरे जीवों की प्रकिर्या भी अपडेट हुई।सब जीवों का चरण चक्र भी बदला गया क्योंकि मानव से सब जोड़ना था जो उसके लिए ज्यादा उपयोगी थे उनकी आयु कम रखी गई।कम उपयोगी की ज्यादा।लेकिन जब इसके निर्माण से पहले सब सद्गुण मिलकर ब्रह्मा जी के पास गए तो उनको दोपहर 12 बजे का वक्त दिया गया था उस समय परकास पूर्ण होता है धरती के मध्य में सूर्य आ जाता है परछाई नहीं बनती है।लेकिन वो सुबह 4 बजे ही पहुंच गए।अंधेरे में यानी 4 बजे का समय जागृति का समय है इसी समय मानव की कल्पना हुई।लेकिन अंधेरे के कारण 5 अवगुण भी 32 गुणों के साथ सरीर में छुप के चले गए क्योंकि परछाई सरीर से अलग नहीं हुई थी क्योंकि वो सरीर में थी तो अवगुण भी छुप गए थे।ओर इन अवगुणों ने ही काम ,क्रोध ,मद, लोभ, मोह ने गुणों को भी कई बार दबाने की चेस्टा की ओर अपना परिबार मानव में बसाना चाहा।सरीर का राजा प्राण को बनाया लेकिन प्रधानमंत्री बुद्धि को बनाया जो कई बार लालची, बेवकूफ बन मन और इन्द्रियों के बस में होकर गलत प्रवृति में लिप्त हुई।बचाव के लिए योग और ध्यान तथा भजन मनन आदि का निर्माण भी सद्कर्मो सद्गुणों के कारण मानव बुद्धि से ही परमपिता ने करवाये।प्राण को आदेश दिया गया कि मृत्यु उपरांत सरीर से 1.मन 2.बुद्धि इसकी यादें आदि समेट के 3.आत्मा को परमात्मा तक लाने का काम तेरा है यानी तीनो का स्वामी प्राण है।इंद्रियों का सरीर रूपी ढांचे में बाहरी ओर आंतरिक चीजें दिखाना काम है।
अगर एक दम मनुष्य धरती पे भेजा जाता तो हाल वही होता जो किसी गली में अचानक किसी जानवर के आने पर उस गली के कुत्ते उसका स्वागत में करते हैं।
कहानी अभी बाकी है.......
कहानी सिर्फ मनोरंजन के लिए है कहीं आप लेखक का मापतोल मन में बिठाने हेतु दौड़ रहे हो । लेंकिन असली ज्ञान आपकी बुद्धि में है ।ये कहानी सिर्फ मनोरंजन के उद्देश्य से है इसे किसी ग्रंथ की उतरोक्ति उसकी नकल या मर्म ना समझ सिर्फ लेखक की कल्पना मात्र तक ही चितो ग्रहण करें।
आपका अपना विकास तंवर खेडी
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