दिवाली के दिन श्री राम लोटे थे बनवास से अयोध्या वापिस तो फिर लक्ष्मी माता जी की पुजा क्यों होती है?
दिवाली के दिन तो राम जी वनवास से लौटे थे… फिर लोग लक्ष्मी जी की पूजा क्यों करते हैं?
भारतीय पुराणों और धर्म शास्त्रों के अनुसार दिवाली के दिन ही समुंद्र मंथन के एक चरण में लक्ष्मी जी निकली या अवतरित हुई थी।
वैसे तो लक्ष्मी जी धन धान्य ,समृद्धि ,खुशी, रोशनी और उन्नति का प्रतीक हैं। सर्द पहर का आगमन रोग हरण और नव ऊर्जा का संचार करता है। अतः ये अपने आप में एक उत्सव है।
दूसरा वक्तव्य और मान्यता अमावस्या एक अंधेरा और सर्दी के मौसम की शुरुवात का दीन है। जिसे भारतीय शास्त्र रोशन करके खुशी में तब्दील करने पे बल देते हैं। अंधेरे का रोशनी में फेरबदल एक मात्र भारतीय संस्कृति में संभव है ये वैसे ही है जैसे मृत्य शरीर को संजीवन अतः ये उत्साह और उमंग वाला त्यौहार है।
और भी अनेक मान्यताएं दीवाली के दिन की हैं।
मान्यताएं और तथ्य जो विभिन्न परम्पराओं और पीढ़ियों से पर्चलन में है दीपावली उत्सव।
– कहा जाता है कि दिवाली को लक्ष्मी पूजा का कारण समुद्र मंथन है इसे लक्ष्मी जी का जन्म दिवस भी माना जाता है।दरअसल, जब देवताओं और असुरों के बीच समुद्र मंथन हुआ था तो इसमें से लक्ष्मी जी भी निकली थी। ये मान्यता है कि जिस दिन लक्ष्मी निकली थी, उस दिन कार्तिक कृष्ण पक्ष की अमावस्या थी।यह दिन ही दिवाली के तौर पर मनाया जाता है।माता लक्ष्मी का समुद्र मंथन से आगमन हुआ। उस समय सभी देवताओं ने विनय आराधना की क्योंकी ये समुंद्र मंथन में निकली हर चीज़ वस्तु से उत्तम थी गुणवान थी और साक्षात देवी स्वरूप थी।. इस वजह से दिवाली को लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है। हालांकि, कई लोग इससे 15 दिवस पूर्व सर्द पूर्णिमा को इनका जन्म मानते हैं।
– साथ ही कहा जाता है कि दिवाली के दिन कई राक्षसों का अंत हुआ था, जिसमें बली, नरकासुर आदि। देवी जगदम्बा भवानी इन सब वधों और राक्षसों की हत्या के बाद ही उग्र रूप से लक्ष्मीतत्व में आई हैं। इसलिए दिवाली को अच्छा संकेत माना जाता है और समृद्धि सुंदरता और सर्वगुण संपन्न देवी यानी लक्ष्मी को पूजा जाता है।
दूसरा और मुख्य कारण एक और भी है की श्री राम जी को भगवान विष्णु जी अवतार और माता सीता को लक्ष्मी देवी मां का अवतार माना गया है। माता सीता के आग्न्न प्रमाण सास्थान वापसी अयोध्या में वनवास पूरा कर और लंका काण्ड करके ही श्री राम अयोध्या आए थे इस खुशी में भी यह पर्व मनाया जाता है और लक्ष्मी देवी की पुजा होती है।
श्री राम जी को भगवान विष्णु जी अवतार और माता सीता को लक्ष्मी देवी मां का अवतार माना गया है।
देव उठनी ईकादसी का भी है विशेष महत्व
– एक कहानी ये है कि देवशयनी एकादशी को भगवान नारायण सो जाते हैं ।और दिवाली के 11 दिन बाद आने वाली देवउठनी एकादशी को उठते हैं. जिस दीपावली पर माता लक्ष्मी के साथ तमाम देवी-देवताओं की विशेष रूप से पूजा की जाती है, दीपावली पर धन की देवी मां लक्ष्मी लोगों के घर में अकेले भगवान विष्णु के बिना पधारती हैं क्योंकी विष्णु भगवान चातुर्मास सयन के कारण योग मुद्रा में होते हैं।. वहीं देवताओं में प्रथम पूजनीय माने जाने वाले गणपति उनके साथ अन्य देवताओं की तरफ अहम प्रतिनिधी होते हैं. हालांकि दीपावली के बाद जब भगवान विष्णु कार्तिक पूर्णिमा के दिन योगनिद्रा से जागते हैं तो सभी देवता ओर मनुष्य एक बार भगवान विष्णु जी के साथ मां लक्ष्मी का विशेष पूजन करके एक बार फिर दीपावली का पर्व मनाते ये पर्व देवउठनी एकादशी का होता हैं।
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